मंदिर में परिक्रमा का महत्व: विधि, नियम और वैज्ञानिक आधार
देव मूर्ति की परिक्रमा का महत्व और इसका वैज्ञानिक आधार
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ की कई विधियां बताई गई हैं, जिनमें से एक प्रमुख विधि है परिक्रमा। जब भक्त किसी देवता के मंदिर में जाता है, तो वह उनकी मूर्ति की परिक्रमा अवश्य करता है। यह सिर्फ धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक मान्यताएं भी हैं।
परिक्रमा का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व
परिक्रमा का अर्थ है किसी पवित्र वस्तु या व्यक्ति के चारों ओर घूमना। जब किसी मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, तो वहां एक ऊर्जा क्षेत्र उत्पन्न होता है। यह ऊर्जा क्षेत्र प्रतिमा के आसपास कुछ मीटर तक सक्रिय रहता है।
मंदिरों में देवी-देवताओं की मूर्तियों के चारों ओर घुमने से उस दिव्य ऊर्जा का प्रभाव भक्तों पर पड़ता है, जिससे वे आध्यात्मिक रूप से अधिक शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी, जब हम दक्षिणावर्त (घड़ी की सुई की दिशा में) परिक्रमा करते हैं, तो शरीर की जैविक ऊर्जा (Bio Energy) संतुलित रहती है और सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होता है।
क्यों की जाती है दक्षिणावर्त परिक्रमा?
भारतीय धार्मिक परंपराओं में परिक्रमा हमेशा दाहिनी ओर (घड़ी की सुई की दिशा में) की जाती है, जिसे “प्रदक्षिणा” कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि –
- देवताओं की ऊर्जा दक्षिणवर्ती होती है – यह ऊर्जा मंदिर के भीतर दक्षिणावर्त दिशा में प्रवाहित होती है, जिससे भक्त अधिक लाभ प्राप्त कर सके।
- ऊर्जा संतुलन बना रहता है – जब भक्त दाहिनी ओर से घूमता है, तो उनकी ऊर्जा देवता की ऊर्जा के साथ संगत हो जाती है, जिससे सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- शरीर और मन पर प्रभाव – वैज्ञानिक रूप से, जब हम दक्षिणावर्त परिक्रमा करते हैं, तो हमारा रक्त संचार सही रहता है और शरीर में सकारात्मक कंपन (Positive Vibrations) उत्पन्न होते हैं।
वामावर्त परिक्रमा क्यों वर्जित है?
वामावर्त (उल्टी दिशा में) परिक्रमा को अशुभ माना जाता है, क्योंकि यह देवताओं की दिव्य ऊर्जा से विपरीत प्रभाव डालती है।
- वामवर्ती परिक्रमा से दैवीय ऊर्जा के प्रवाह में बाधा आती है, जिससे भक्त को लाभ मिलने की बजाय मानसिक और शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ सकता है।
- यह पाप स्वरूप माना जाता है और इसका नकारात्मक प्रभाव व्यक्ति के जीवन में बाधाएं उत्पन्न कर सकता है।
भिन्न-भिन्न देवताओं की परिक्रमा के नियम
हर देवता की परिक्रमा करने के नियम अलग-अलग बताए गए हैं –
- भगवान श्रीकृष्ण – तीन बार परिक्रमा की जाती है।
- देवी दुर्गा – केवल एक बार परिक्रमा करने का विधान है।
- भगवान शिव – शिवलिंग की परिक्रमा पूरी नहीं की जाती। अर्ध-परिक्रमा (आधी परिक्रमा) का नियम है, क्योंकि शिवलिंग पर जलधारा को पार करना वर्जित होता है।
- भगवान विष्णु – विष्णु मंदिर में परिक्रमा करने का विशेष फल बताया गया है।
- हनुमान जी – हनुमान मंदिर में सात बार परिक्रमा करने की मान्यता है।
परिक्रमा करने के नियम
परिक्रमा करते समय भक्तों को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए –
✅ परिक्रमा के दौरान मंत्र जाप करें – जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनके मंत्र का जाप मन में करते रहें।
✅ जूते-चप्पल निकालें – परिक्रमा हमेशा नंगे पैर करें, ताकि ऊर्जा का प्रवाह बाधित न हो।
✅ श्रद्धा और एकाग्रता बनाए रखें – परिक्रमा करते समय निंदा, बुराई, क्रोध या कोई नकारात्मक विचार मन में न लाएं।
✅ ध्यानपूर्वक परिक्रमा करें – हंसते-खेलते, बातचीत करते हुए या धक्का-मुक्की करके परिक्रमा करना उचित नहीं है।
✅ धार्मिक वस्त्र और माला धारण करें – तुलसी माला, रुद्राक्ष, कमलगट्टे की माला आदि धारण करना शुभ माना जाता है।
शास्त्रों में परिक्रमा का उल्लेख
पद्म पुराण में हरि पूजा विधि वर्णन के अंतर्गत श्लोक 115-117 में कहा गया है –
हरिप्रदक्षिणे यावत्पदं गच्छेत् शनैः शनैः। पदपदेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥
यावत्पादं नरो भक्त्या गच्छेद्विष्णुप्रदक्षिणे। तावत्कल्पसहस्राणि विष्णुना सह मोदते॥
प्रदक्षिणीकृत्य सर्वं संसारं यत्फलभवेत्। हरि प्रदक्षिणीकृत्यं तस्मात्कोटिगुणं फलम्॥
अर्थ:
जो व्यक्ति भगवान विष्णु की परिक्रमा श्रद्धा और भक्तिभाव से करता है, वह प्रत्येक कदम पर अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य अर्जित करता है। परिक्रमा करने से भक्त को हजारों कल्पों तक विष्णु धाम में आनंद प्राप्त होता है।
निष्कर्ष
देव मूर्ति की परिक्रमा केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया भी है। यह सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने, आत्मिक शांति प्राप्त करने और जीवन में शुभ फल पाने का एक प्रभावी माध्यम है। इसलिए जब भी मंदिर जाएं, पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से परिक्रमा करें, ताकि उसका अधिकतम लाभ मिल सके।
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